सी-सेक्शन के बाद कई महिलाओं को लगता है कि ऑपरेशन से बच्चा हुआ है, तो ब्लीडिंग नहीं होगी। दरअसल, सी-सेक्शन डिलीवरी के बाद लगभग हर महिला को ब्लीडिंग होती है। इसे मेडिकल भाषा में लोकिया (Lochia) कहा जाता है। यह गर्भाशय के ठीक होने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।
इस लेख में आप जानेंगे कि सी-सेक्शन के बाद ब्लीडिंग कब तक होती है, रुक-रुक कर ब्लीडिंग क्यों होती है, घर पर देखभाल कैसे करें और कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ।

सी-सेक्शन के बाद कई महिलाओं को लगता है कि ऑपरेशन से बच्चा हुआ है, तो ब्लीडिंग नहीं होगी। दरअसल, सी-सेक्शन डिलीवरी के बाद लगभग हर महिला को ब्लीडिंग होती है। इसे मेडिकल भाषा में लोकिया (Lochia) कहा जाता है। यह गर्भाशय के ठीक होने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा है।
गर्भावस्था में गर्भाशय की अंदरूनी परत और प्लेसेंटा (नाल) खून की नसों के ज़रिए जुड़े रहते हैं। बच्चे और प्लेसेंटा के बाहर आने के बाद गर्भाशय में उस जगह पर एक घाव रह जाता है। जब तक यह घाव भरता रहता है, गर्भाशय खून, बलगम और टिशू को योनि के रास्ते बाहर निकालता रहता है। यही लोकिया है। यह नॉर्मल और सी-सेक्शन, दोनों तरह की डिलीवरी के बाद होता है।
1. प्लेसेंटा की जगह का घाव: गर्भाशय में प्लेसेंटा के जुड़ने की जगह को ठीक होने में समय लगता है।
2. गर्भाशय का सिकुड़ना: डिलीवरी के बाद गर्भाशय धीरे-धीरे अपने सामान्य आकार में लौटता है। इस दौरान बचा हुआ खून और टिशू बाहर आते हैं।
3. गर्भाशय की परत का निकलना: गर्भावस्था में मोटी हुई अंदरूनी परत धीरे-धीरे झड़ती है।
4. हार्मोनल बदलाव: डिलीवरी के बाद हार्मोन के स्तर में तेज़ी से बदलाव होते हैं, जिसका असर ब्लीडिंग के पैटर्न पर पड़ता है।
आमतौर पर ब्लीडिंग 4 से 6 हफ्तों तक चलती है। कुछ महिलाओं में हल्की ब्लीडिंग छह हफ्ते तक रह सकती है। सी-सेक्शन में पहले 24 घंटों के बाद ब्लीडिंग नॉर्मल डिलीवरी की तुलना में कम हो सकती है।
हर महिला अलग होती है, इसलिए कुछ दिन आगे-पीछे होना सामान्य है।
सी-सेक्शन के बाद रुक-रुक कर ब्लीडिंग होना कई महिलाओं में देखा जाता है। ब्लीडिंग कुछ दिनों तक कम होने के बाद अचानक फिर बढ़ सकती है। इसके आम कारण हैं:
● ज़्यादा चलना-फिरना या काम करना: ज़्यादा थकान या भारी काम के बाद फ्लो कुछ देर बढ़ सकता है।
● लेटने के बाद उठना: लेटे रहने पर जमा हुआ खून उठते ही एक साथ निकल सकता है।
● ब्रेस्टफीडिंग: फीडिंग के दौरान गर्भाशय सिकुड़ता है, जिससे थोड़ा खून निकल सकता है।
● पीरियड की वापसी: 4–6 हफ्ते बाद दोबारा शुरू हुई ब्लीडिंग पीरियड भी हो सकती है। ब्रेस्टफीडिंग करने वाली माताओं में पीरियड देर से लौट सकते हैं।
● ब्लीडिंग कम होने के बाद अचानक बहुत ज़्यादा होने लगे।
● बदबूदार डिस्चार्ज या बुखार हो।
● 6–8 हफ्ते बाद भी रोज़ ब्लीडिंग हो रही हो।
● पेट में बढ़ता दर्द हो।
ये गर्भाशय में बचे हुए टिशू, इन्फेक्शन या गर्भाशय के ठीक से न सिकुड़ने के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से जाँच करवाना और ज़रूरत पड़ने पर इलाज कराना ज़रूरी है।

डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग रोकने के घरेलू उपाय ब्लीडिंग को पूरी तरह रोकने के लिए नहीं किए जाते, क्योंकि सामान्य लोकिया को रोकना ज़रूरी नहीं है। घरेलू उपाय केवल रिकवरी में मदद करते हैं और ज़्यादा ब्लीडिंग का इलाज नहीं हैं। देखभाल के कुछ सुरक्षित तरीके हैं:
1. भरपूर आराम करें: ज़्यादा चलना-फिरना और भारी सामान उठाना टालें। सी-सेक्शन के टाँकों के लिए भी यह ज़रूरी है।
2. बच्चे को नियमित स्तनपान कराएँ: फीडिंग से गर्भाशय को सिकुड़ने में मदद मिलती है।
3. पर्याप्त पानी और अन्य तरल पदार्थ लें: दाल, सूप, नारियल पानी और छाछ लें।
4. आयरन और प्रोटीन से भरपूर भोजन करें: पालक, चुकंदर, दालें, अंडा, पनीर और गुड़-चना खाएँ। खून की कमी से कमजोरी बढ़ सकती है।
5. सिर्फ मैटरनिटी पैड इस्तेमाल करें: पोस्टनेटल चेकअप तक टैम्पोन और मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल न करें। पैड से ब्लीडिंग पर नज़र रखना आसान होता है।
6. साफ-सफाई रखें: पैड नियमित रूप से बदलें और प्राइवेट पार्ट्स को साफ़ और सूखा रखें।
7. डॉक्टर के बताए अनुसार दवा लें: दर्द, आयरन और कैल्शियम की दवाएँ बिना सलाह के बंद न करें।
● ब्लीडिंग रोकने के लिए कोई भी जड़ी-बूटी, काढ़ा या पाउडर डॉक्टर से पूछे बिना न लें।
● योनि में कुछ भी न डालें।
● ब्लीडिंग “रोकने” के लिए पेट की ज़ोरदार मालिश न करवाएँ (डॉक्टर या नर्स द्वारा बताई गई हल्की गर्भाशय मालिश अलग बात है)।
पहले यह पहचानें कि ब्लीडिंग ज़्यादा है या नहीं। ये संकेत देखें:
● एक घंटे में एक या अधिक पैड का पूरी तरह भीग जाना, या अंडे के आकार के बड़े क्लॉट निकलना।
● चक्कर आना, बेहोशी जैसा महसूस होना या बहुत कमज़ोर महसूस करना।
● दिल की धड़कन का तेज़ या अनियमित होना।
● नया या बढ़ता पेट दर्द।
● साँस फूलना, हाथ-पैर ठंडे या चिपचिपे लगना।
● बदबूदार डिस्चार्ज और बुखार।
ऐसा होने पर तुरंत क्या करें:
1. घबराएँ नहीं और लेट जाएँ।
2. बिना देर किए अपने डॉक्टर को कॉल करें या नज़दीकी अस्पताल की इमरजेंसी में जाएँ। घर पर इंतज़ार न करें।
3. कितने पैड भीगे थे और क्लॉट का साइज़ कितना था, यह डॉक्टर को बताएँ।
4. अकेले न जाएँ, बल्कि किसी को अपने साथ ले जाएँ।
इलाज कारण पर निर्भर करता है। डॉक्टर अल्ट्रासाउंड, ब्लड टेस्ट, गर्भाशय को सिकोड़ने की दवाइयाँ या ज़रूरत पड़ने पर अन्य प्रक्रियाओं की सलाह दे सकते हैं।

आमतौर पर डिलीवरी के 6 हफ्ते बाद चेकअप होता है। लेकिन ऊपर बताए गए खतरे के संकेत हों, तो चेकअप का इंतज़ार न करें।
● पोस्टनेटल सपोर्ट: अनुभवी नर्सें और लैक्टेशन कंसल्टेंट ब्रेस्टफीडिंग, नवजात की देखभाल और माँ की रिकवरी के बारे में मार्गदर्शन देते हैं।
● जन्म के विकल्प: माँ की ज़रूरत के अनुसार नॉर्मल डिलीवरी, एपिड्यूरल और सिजेरियन के विकल्प।
● NICU: नियोनेटोलॉजिस्ट की देखरेख में 24×7 निगरानी।
● अनुभव: 1,80,000 से ज़्यादा सफल डिलीवरी और 2000+ डॉक्टरों की टीम (Practo पर दर्ज जानकारी)।
● पोस्ट-ऑपरेटिव फॉलो-अप: मरीज़ों के रिव्यू में ऑपरेशन के बाद की देखभाल और नर्सिंग स्टाफ की तारीफ़ मिलती है।
● इंश्योरेंस: प्रमुख हेल्थ इंश्योरेंस प्रोवाइडर्स के साथ साझेदारी।
अगर आपको सी-सेक्शन के बाद ज़्यादा ब्लीडिंग, रुक-रुक कर ब्लीडिंग या कोई भी चिंता हो, तो अपने नज़दीकी Cloudnine अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें। समय पर जाँच से जटिलताओं से बचा जा सकता है।
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शुरुआती 24 घंटों के बाद कई महिलाओं में ब्लीडिंग थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन हर महिला का अनुभव अलग होता है।
शारीरिक गतिविधि बढ़ने पर ब्लीडिंग थोड़ी बढ़ सकती है। लेकिन तेज़ ब्लीडिंग, बदबू, बुखार या दर्द हो, तो डॉक्टर को दिखाएँ।
शुरुआती दिनों में छोटे क्लॉट सामान्य हैं। अंडे से बड़े क्लॉट आएँ या लगातार क्लॉट निकलें, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
हाँ, स्तनपान सुरक्षित है और गर्भाशय को सिकुड़ने में मदद करता है।